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US-Iran War के 100 दिन: बढ़ती चिंता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट

June 8, 2026 | by Goltoo

trump12

8 June : US-Iran War को 7 जून को 100 दिन पूरे हो गए। इन सौ दिनों में जितने व्यापक और गंभीर दुष्प्रभाव देखने को मिले हैं, उतने प्रभाव कई विश्लेषकों के अनुसार रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआती वर्षों में भी नहीं दिखाई दिए थे। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि फिलहाल युद्धविराम की कोई स्पष्ट संभावना नजर नहीं आ रही है। आशंका जताई जा रही है कि कहीं यह संघर्ष भी रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह वर्षों तक न खिंच जाए।

US-Iran War 7 जून को 100 दिन पूरे हो गए।

युद्ध का वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना हुआ है और आगे कितना होगा, इसका सटीक आकलन अभी संभव नहीं है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस संघर्ष में अब तक 7,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लगभग 45,000 लोग घायल हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या उन निर्दोष नागरिकों की है, जिनका इस युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं था।

28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमले के बाद यह अनुमान लगाया गया था कि ईरान अधिक समय तक प्रतिरोध नहीं कर पाएगा। लेकिन ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुनिया को चौंका दिया। इस संघर्ष ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि युद्धों से आखिर मानवता और युद्धरत देशों को क्या हासिल होता है।

US-Iran War 7 जून को 100 दिन पूरे हो गए।
US-Iran War 7 जून को 100 दिन पूरे हो गए।

US-Iran War मुख्य रूप से अमेरिका और ईरान के बीच है, लेकिन स्वयं अमेरिका के भीतर भी इसे लेकर मतभेद दिखाई देते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार जीत का दावा कर रहे हैं, जबकि अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग इस दावे से सहमत नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल 16 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक मानते हैं कि उनका देश इस युद्ध में स्पष्ट बढ़त या जीत हासिल कर पाया है।

इस संघर्ष ने वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्गों के महत्व को भी दुनिया के सामने स्पष्ट कर दिया है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों की भूमिका को अब पूरी दुनिया गंभीरता से समझ रही है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक असर पड़ा है, जिसका आर्थिक बोझ दुनिया के अधिकांश देश झेल रहे हैं।

भारत सहित अनेक विकासशील देशों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई दे रहा है। यदि निकट भविष्य में युद्धविराम नहीं होता, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा और गहरा सकता है। महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है, जिससे आम लोगों का जीवन और अधिक कठिन हो सकता है।

इतिहास गवाह है कि युद्ध विनाश तो लाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान बहुत कम देते हैं। ऐसे में विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है कि संवाद, कूटनीति और शांति के प्रयासों को प्राथमिकता देकर इस संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में गंभीर पहल करे।

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