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LS College में चंपारण सत्याग्रह में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका पर व्याख्यान

August 23, 2026 | by Goltoo

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Muzaffarpur 23 August : LS College के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के तत्वावधान में शनिवार को पुस्तक परिचर्चा एवं व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

LS College में चंपारण सत्याग्रह पर व्याख्यान

इस अवसर पर “चंपारण में नील संघर्ष के सिपाही (1867-1918)” शीर्षक पुस्तक पर विस्तृत चर्चा हुई, साथ ही “चंपारण सत्याग्रह में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका” विषय पर एक व्याख्यान भी आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ इतिहासकार श्री भैरव लाल दास उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि की भूमिका में प्रो. भोजनंदन प्रसाद सिंह मौजूद थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने की।

प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा, चंपारण का नील संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सत्याग्रह के उस दर्शन का प्रारंभ बिंदु है, जिसने आगे चलकर संपूर्ण राष्ट्र को एकजुट किया। पंडित राजकुमार शुक्ल का समर्पण इस बात का प्रमाण है कि परिवर्तन की शुरुआत सदा साधारण जन से होती है। इतिहास विभाग इस प्रकार के शोधपरक आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना जागृत कर रहा है। आवश्यक है कि आज की युवा पीढ़ी इन गुमनाम नायकों के त्याग एवं संघर्ष से प्रेरणा ले और उसे अपने जीवन-मूल्यों में उतारे।

LS College में चंपारण सत्याग्रह में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका पर व्याख्यान
LS College में चंपारण सत्याग्रह में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका पर व्याख्यान

इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. पुष्पा कुमारी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह आयोजन महज एक पुस्तक चर्चा नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

मुख्य वक्ता श्री भैरव लाल दास ने व्याख्यान में पंडित राजकुमार शुक्ल के योगदान को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शुक्ल जी स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम किरण थे। उनके अथक एवं अनवरत प्रयासों ने ही महात्मा गांधी को चंपारण की धरती पर कदम रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आगे कहा कि यदि पंडित शुक्ल का संकल्प न होता, तो संभवतः सत्याग्रह के इस स्वर्णिम अध्याय की रचना ही न हो पाती। उनकी निष्ठा और लगन आज भी यह सिखाती है कि सत्य एवं अहिंसा का मार्ग कितना सशक्त और प्रभावी हो सकता है।

विशिष्ट अतिथि प्रो. भोजनंदन प्रसाद सिंह ने पुस्तक की विषय-वस्तु की सराहना करते हुए कहा कि यह कृति चंपारण के नील संघर्ष में सक्रिय रहे उन अनगिनत सिपाहियों की गाथा है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में समुचित स्थान नहीं मिल सका। उन्होंने कहा कि जब वर्तमान युवा पीढ़ी इन ऐतिहासिक तथ्यों से अवगत होगी, तब उसे यह अनुभूति होगी कि स्वतंत्रता संग्राम कितना व्यापक, सामूहिक और बहुआयामी था। संचालन डॉ राजीव कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दिलीप कुमार यादव ने किया।

मौके पर पीजी इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. रेनू कुमारी, प्रो. एसआर चतुर्वेदी, डॉ संतोष कुमार अनल, डॉ धीरेंद्र कुमार, डॉ आनंद कुमार सिंह सहित अन्य मौजूद रहे।

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