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Hindi Diwas हिंदी दिवस : निज भाषा की उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल !!!

Hindi Diwas हिंदी दिवस पर लेखक - डॉ पंकजवासिनी,रामसेवक सिंह महाविद्यालय,सीतामढ़ी Hindi Diwas हिंदी दिवस पर लेखक - डॉ पंकजवासिनी,रामसेवक सिंह महाविद्यालय,सीतामढ़ी
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Muzaffarpur 14 September : Hindi Diwas हिंदी दिवस पर, हिंदी साहित्य के इतिहास में पितामह की पदवी से समादृत आधुनिक युग के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा हिंदी भाषा की गरिमा -गाथा की ओर ध्यानाकर्षण करती हुई सृजित हैं ये पंक्तियाॅं.

Hindi Diwas हिंदी दिवस

अपनी मातृभाषा के महत्व, क्षमता, शक्ति , सामर्थ्य ,गरिमा और महिमा को रेखांकित करती ये पंक्तियाॅं पुरजोर तरीके से इस बात की वकालत करती हैं कि निज भाषा यानी मातृभाषा की उन्नति ही मनुष्य के सर्वांगीण विकास की कुंजी है और मनुष्य के आत्मिक एवं आध्यात्मिक विकास का मूल आधार है . जब तक किसी व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का ज्ञान नहीं होगा तब तक उसके हृदय की पीड़ा मिट नहीं सकती ! उसकी आत्मा की प्यास बुझ नहीं सकती.

Hindi Diwas हिंदी दिवस पर लेखक - डॉ पंकजवासिनी,रामसेवक सिंह महाविद्यालय,सीतामढ़ी
Hindi Diwas हिंदी दिवस पर लेखक – डॉ पंकजवासिनी,रामसेवक सिंह महाविद्यालय,सीतामढ़ी

गुरुदेव कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा भी है कि किसी भी विदेशी भाषा या अंग्रेजी के माध्यम से पढ़कर हम सिर्फ शिक्षित हो सकते हैं, सुसंस्कृत नहीं . अपनी मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त करके ही हमारी आत्मा संस्कारित होती है ।” और आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि हमारे देश में चारों ओर अंग्रेजी भाषा में ही शिक्षा- दीक्षा दी जा रही है ।लोग अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करना ही अपना परम सौभाग्य समझ रहे हैं । पर अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर हम अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम बन रहे हैं और अंग्रेजी ,अंग्रेजियत और पाश्चात्य सभ्यता- संस्कृति पर गर्व करते हैं तथा अपनी गरिमामयी भारतीय सभ्यता – संस्कृति तथा हिंदी भाषा पर शर्म.

मैक्समूलर ने कहा भी था कि भारत देश इतना गरिमामय और सामर्थ्यवान है कि अगर इस देश को हराना है तो सबसे पहले इस देश की संस्कृति को नष्ट करो जो कि इस देश के हर गाॅंव में दिए जाने वाली गुरुकुल- शिक्षा पद्धति में जीवंत है , जो उनकी मातृभाषा में दी जा रही है। सबसे पहले इनकी इस गुरुकुल शिक्षा- पद्धति को नष्ट कर दो, तभी हम इन्हें अपना गुलाम बना सकते हैं । और सच में इस अंग्रेजी शिक्षा -पद्धति ने देश में ऐसे नागरिकों की पौध पैदा की है और करती जा रही है जो विशुद्ध स्वार्थी तथा आत्म केंद्रित, उपभोक्तावादी एवं बाजारवादी है। पारिवारिक सामाजिक राष्ट्रीय सह- अस्तित्व, स्नेह- सौहार्द्र और समष्टि- भावना एवं सामुदायिक विकास तथा मानवता एवं राष्ट्र के कल्याण एवं प्रगति से इस आत्म केंद्रित समुदाय का कोई लेना -देना नहीं है.

अपने इंच भर के स्वार्थ के लिए ये देश को भी बेच देने से परहेज नहीं करेंगे! निज भाषा यानी मातृभाषा के ज्ञान से जिन आदर्शों, मूल्यों , सिद्धांतों एवं नैतिकता तथा उच्च गुणों का व्यक्तित्व में विकास होता है, उन सब का इन विदेशी भाषा में शिक्षित लोगों में नितांत अभाव है । स्नेह, सौहार्द्र ,प्रेम, परोपकार ,त्याग, उत्सर्ग, करुणा, दया से हीन आज की अंग्रेजी पढ़ी-लिखी पीढ़ी सूट- बूट से लैस, सुरा- सुंदरी में लिप्त , रात-रात तक क्लबों में डीजे पर झूमती अपनी गरिमामयी संस्कृति से कोसों दूर है। लोभ, मोह -मद -स्वार्थ में डूबी हुई यह पीढ़ी समाज में हर तरह की अराजकता फैला रही है. गली- चौक -चौराहों पर नारियों की गरिमा को तार-तार कर रही है, बूढ़ों को अपमानित कर रही है , बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज रही है , हिंसा में लिप्त है और अपने घृणित कृत्य से मानवता को शर्मसार कर रही है ।

मातृभाषा में दी गई गरिमामय संस्कृति की यह सीख : अभिवादनशीलस्य नित्यम् वृद्धोपसेविन: !
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।। , कृण्वन्तो विश्वार्यम् , वसुधैव कुटुंबकम् आदि से निरंतर दूर होती जा रही है।

दुष्परिणामत: कभी विश्व का आध्यात्मिक गुरु रहा भारत आज अंग्रेजी भाषा में साक्षर -शिक्षित होकर पाश्चात्य की चकाचौंध से भ्रमित है; आत्मीय संबंधों में भी बाजारवाद से ग्रसित है ।

Hindi Diwas हिंदी दिवस पर लेखक – डॉ पंकजवासिनी,रामसेवक सिंह महाविद्यालय,सीतामढ़ी

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